Waqt toh waqt par badalta hai, Insaan toh kisi bhi waqt badal jata hai.
कहा जाता हैं की वक़्त इंसान को बदल देता हैं। या फिर यू कहिये की जो इंसान वक़्त के साथ अपने आप को बदल देता हैं, दुनिया की इस दौड़ में वही टीक पाता हैं और जो वक़्त के साथ नही बदलता वो कही इस दुनिया की भीड़ में कही खो जाता हैं।
युही नजर फिर एक पेड़ पे जाती हैं और सोचता हुन की एक पेड़ जिसकी जड़े मजबूत हो वो हमेशा खड़ा रहता हैं। मौसम में कही तरह के बदलाव के बाद भी वो खड़ा रहता हैं। बदलते मौसम के अनुसार वो अपने पत्ते गिरा देता हैं और नए पत्ते फिर से उसकी टहनियों पर आ जाते हैं जब समय का चक्र फिर से घूमता हैं। अब सवाल ये हैं की पेड़ अपना रूप खुद बदल देता हैं या फिर उसे वक़्त के साथ बदलना पड़ता हैं ताकि वो हमेशा की तरह खड़ा रह सके ?
अगर फिर हुम् पेड़ और इंसान को इसी मापदण्ड से तोले तो कहा जा सकता हैं की जैसे पेड़ वक़्त के साथ साथ बदलता हैं, इंसान का भी कुछ ऐसा ही हैं।
जैसे पेड़ के साथ होता हैं, क्या इंसान का ये बदलाव भी समय की अनुसार जान बुझकर किया जाने वाला बदलाव होता हैं और क्या इंसान फिर जब वक़्त बदलता हैं तब अपने मूल स्वभाव में आ जाता हैं ?
अगर ऐसा हैं, तो हुम् क्यों ये कहते हैं की इंसान बदल गया हैं, जब की इंसान तो वही होता हैं, बदला अगर कुछ होता हैं, तो वो इंसान नही बल्की इंसान का वक़्त होता हैं।

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